नमस्कार 🙏 हमारे न्यूज पोर्टल - मे आपका स्वागत हैं ,यहाँ आपको हमेशा ताजा खबरों से रूबरू कराया जाएगा , खबर ओर विज्ञापन के लिए संपर्क करे +91 8894723376 ,हमारे यूट्यूब चैनल को सबस्क्राइब करें, साथ मे हमारे फेसबुक को लाइक जरूर करें , पर्यावरण सरंक्षण एवम वन सरंक्षण एक्ट 1980: यह एक्ट केंद्र सरकार ने यानी संसद ने वनों के घटते क्षेत्रफल और धरती के बढ़ते तापमान और बदलते मौसम को ध्यान में रख कर बनाया गया! जिस के पिछले 43 साल में अच्छे परिणाम देखने को मिले – लाइव ऑल हिमाचल न्यूज

पर्यावरण सरंक्षण एवम वन सरंक्षण एक्ट 1980: यह एक्ट केंद्र सरकार ने यानी संसद ने वनों के घटते क्षेत्रफल और धरती के बढ़ते तापमान और बदलते मौसम को ध्यान में रख कर बनाया गया! जिस के पिछले 43 साल में अच्छे परिणाम देखने को मिले

😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊

पर्यावरण सरंक्षण एवम वन सरंक्षण एक्ट 1980: यह एक्ट केंद्र सरकार ने यानी संसद ने वनों के घटते क्षेत्रफल और धरती के बढ़ते तापमान और बदलते मौसम को ध्यान में रख कर बनाया गया! जिस के पिछले 43 साल में अच्छे परिणाम देखने को मिले

लेखिक:-पर्यावरणप्रेमी D.r श्री अशोक कुमार सोमल पीएचडी रि.डीएफओ

पर्यावरण बचाओ, मानवता को बचाओं

पर्यावरण ही जीवन है, सृष्टि का अंत भी है

हाईलाइट विशेष

1 पूर्व मुख्यमंत्रीवीरभद्र ने 1980 से हिमाचल प्रदेश में ग्रीन फेलिंग यानी वनों के दोहन पर पूरी तरह बंदिश लगाई

2 सुप्रीम कोर्ट के 1996 गोदाबरमन केस के ऐतिहासिक फैसले ने और धार दी!

3 जब भी किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए वन भूमि के इस्तेमाल के लिए जरूरत हो तो इसे कुछ शर्तों के साथ केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद इजाजत मिलती है! इसमें नियमों में समय समय पर ढील दी गई है और जब भी राजनीतिक नेतृत्व को अवश्यकता पड़ी तो इसे कई जगह नियमों को ताक पर भी रखा जाता रहा है!

4 जितना भी हिमाचल में बरसात में बाढ़ से नुकसान हुआ है यह पिछले सालों में विकास के नाम पर किए गए पर्यावरण से खिलवाड़ का ही नतीजा है! और इसके लिए केंद्र और प्रदेश सरकार ही जिम्मेदार हैं!

5 सडकों , भवनों, उधोगों आदि का निर्माण होगा तो पर्यावरण को नुकसान होगा लेकिन इस पर्यावरण नुकसान को कम भी किया जा सकता है। ज्यादा से ज्यादा पुलों को अधिमान दिया जा सकता

6 भू-स्वखलन एक बार शुरू हो गया तो रोकना असंभव और नामुमकिन है हां नुकसान को कम किया जा सकता है।

पर्यावरण सरंक्षण एवम वन सरंक्षण एक्ट 1980: यह एक्ट केंद्र सरकार ने यानी संसद ने वनों के घटते क्षेत्रफल और धरती के बढ़ते तापमान और बदलते मौसम को ध्यान में रख कर बनाया गया! जिस के पिछले 43 साल में अच्छे परिणाम देखने को मिले साथ में पूर्व मुख्यमंत्रीवीरभद्र ने 1980 से हिमाचल प्रदेश में ग्रीन फेलिंग यानी वनों के दोहन पर पूरी तरह बंदिश लगाई इसके भी अच्छे परिणाम देखने को मिले जिसे सुप्रीम कोर्ट के 1996 गोदाबरमन केस के ऐतिहासिक फैसले ने और धार दी! इससे राजनीतिक और प्रशासनिक गठजोड़ से वनों में बेवजह पड़ रहे दबाव पर कुछ हद तक कमी आई! 

ऐसा नहीं है कि वन सरंक्षण कानून के आने से विकास पर कोई विपरीत असर पड़ा हो पर इस कानून में इतना है कि जब भी किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए वन भूमि के इस्तेमाल के लिए जरूरत हो तो इसे कुछ शर्तों के साथ केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद इजाजत मिलती है! इसमें नियमों में समय समय पर ढील दी गई है और जब भी राजनीतिक नेतृत्व को अवश्यकता पड़ी तो इसे कई जगह नियमों को ताक पर भी रखा जाता रहा है! पर राजनीतिक और प्रशासनिक लोगों ने इसे अपनी नाकामी को छुपाने या इसे किसी भी प्रोजेक्ट को लटकाने के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल किया! 

अभी जब देश में विशेषकर हिमाचल में वर्षा कुछ ज्यादा हुई तो देश और प्रदेश के उच्च जगहों पर बैठे लोगों की प्रदेश के भीतर और पंजाब में बाढ़ से हुए नुकसान को देखते हुए आंखें खुली! पर फिर भी उन्हें इसके मुख्य कारणों का आभास नहीं हुआ!

देश में पिछले 10 साल के आंकड़े उठा कर देखें तो सबसे ज्यादा वन क्षेत्र में कमी इसी समय में आई है यानी विकास की योजनाएं विशेषकर सड़क बनाने में ही बहुत बड़ा वन क्षेत्र घटा है! हिमाचल में केंद्र सरकार की 4 फोरलेन परवाणु शिमला, किरतपुर मनाली, पठानकोट मंडी और धर्मशाला शिमला के बनाने में चल रहे कार्य में ही इस कानून के तहत मिली मंजूरी के नियमों की बहुत बड़ी अनदेखी हुई है! जिसे NHAI ने भी माना है कि ठेकदारों ने बहुत बड़े पैमाने पर डेब्रिस यानी मक निपटारे में अनदेखी की है! इतना ही नहीं NHAI ने माना की तकनीक में भी बहुत बड़ी खामी रही है! बाकी सड़कों को बनाते समय भी वन सरंक्षण नियमों को नजरंदाज किया गया है इसका जीता जागता उदाहरण पूर्व मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर के सराज विधानसभा क्षेत्र में बनी सड़कें हैं जिनके बनने से वहां आई बड़े पैमाने बाढ़ है!

हाल में हुए संसद के मानसून सत्र में वन सरंक्षण कानून 1980 में बहुत बड़े स्तर पर मोदी सरकार ने बदलाव किए हैं जिसे राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा है

अभी कल ही देश के राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने पर्यावरण के बिगड़ते मजाज पर देश के संबोधन में चिंता जाहिर की है पर उन्हें शायद ही इल्म है कि जो वन सरंक्षण कानून 1980 के बदलाव की स्वीकृति देने जा रही हैं इससे पर्यावरण पर बहुत बड़ा विपरीत असर आने वाले समय पर पड़ेगा! 

हम हिमाचल की पिछले 2 दिनों की घटनाओं का जिक्र कर रहे हैं एक है व्यास नदी में 1974 में पौंग डैम बनने के बाद आने वाले पानी में जिसका माप 7.3 लाख cusec रहा जो आजतक का रिकॉर्ड है और इस में सड़कों के बनने से तैयार हुआ डेब्रिस मक का हिस्सा ज्यादातर है पौंग डैम के जल भंडारण की कैपेसिटी यानी क्षमता भी कम हुई है जिसका आने वाले समय भी प्रभाव दिखेगा!

दूसरा उदाहरण शिमला के समरहील रेल ट्रैक जो 120 साल पहले बना है इसका 50 से 60 मीटर हिस्सा हवा में लटक गया है जिसका मुख्य कारण भूक्षरण ही है जो बेतरतीव विकास का जीता जागता उदाहरण है!

जितना भी हिमाचल में बरसात में बाढ़ से नुकसान हुआ है यह पिछले 10 सालों में विकास के नाम पर किए गए पर्यावरण से खिलवाड़ का ही नतीजा है! और इसके लिए केंद्र और प्रदेशों की सरकार ही जिम्मेदार हैं!

पर्यावरण बचाओ, मानवता को बचाओं

पर्यावरण ही जीवन है, सृष्टि का अंत भी ह

Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें 

Advertising Space


[responsivevoice_button voice="Hindi Male"]