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जिला कांगड़ा आपदा प्रबंधन की एक दिन की बैठक के साथ कार्यशाला में सहभागी के रूप में हिस्सा लिया!, आपदा प्रबंधन में मिटिगेशन यानी बचाव के साथ एडेप्टेशन यानी इसके साथ कैसे जिया जाए या फिर बचा जाए प्रबंध पर सार्थक चर्चा हुई! प्रशासन के साथ गैर सरकारी संस्थाएं व सिविल सोसायटी कैसे आपदा प्रबंधन में योगदान दे

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कांगड़ा आपदा प्रबंधन में मिटिगेशन यानी बचाव के साथ एडेप्टेशन यानी इसके साथ कैसे जिया जाए या फिर बचा जाएप्रबंध पर सार्थक चर्चा हुई। (अशोक कुमार सोमल)

जिला कांगड़ा आपदा प्रबंधन की एक दिन की बैठक के साथ कार्यशाला में सहभागी के रूप में हिस्सा लिया!, आपदा प्रबंधन में मिटिगेशन यानी बचाव के साथ एडेप्टेशन यानी इसके साथ कैसे जिया जाए या फिर बचा     जाये प्रबंध पर सार्थक चर्चा हुई! प्रशासन के साथ गैर सरकारी संस्थाएं व सिविल सोसायटी कैसे आपदा प्रबंधन में योगदान दे सकते हैं इस पर गहन विचार विमर्श हुआ! लोगों में आपदा प्रबंधन के बारे जागरूकता जरूरी है जैसा कि सभी जानते हैं कि हिमाचल भूकंप के बहुत ही संवेदनशील जोन में है अतः कभी भी बड़े रेक्टर स्केल का भूकंप हिमाचल में हो सकता है और हमारी ज्यादातर बिल्डिंग भूकंप रोधी नहीं हैं इसी प्रकार बदलते मौसम की मार भी पड़ेगी जैसे इस बरसात में भारी नुकसान हुआ जिसके लिए प्रशासन और लोग तैयार नहीं थे! जितनी भी आपदाएं आती हैं लगभग सारी मनुष्य द्वारा ही निर्मित हैं जैसे हिमाचल में जो फ्लड की स्तिथि बनी इसमें हमारा अंधाधुंध बिना सोचे समझे विकास ही जिम्मेदार है इसमें सड़कों के निर्माण के साथ दूसरे निर्माण कार्यों में बरती गई लापरवाही ही बहुत बड़ा कारण रहा है! इसके हल के लिए हमारा सुझाव रहा है कि हिमाचल जैसे पहाड़ी क्षेत्रों विशेषकर और देश के दूसरे हिस्सों में साधारणतया भी वाटरशेड प्रबंधन पर यानी जल जंगल जमीन के साथ जानवर व जनमानस का उचित प्रबंधन जरूरी है! यहां हम जमीन को डिस्टर्ब यानी खोद रहे हैं वहां चेक डैम लगाने जरूरी है ड्रेनेज सिस्टम में मिट्टी के सरंक्षण के साथ पानी के बहाव को सारंक्षित करना जरूरी है! हमारा मानना है जो हिमाचल के साथ उत्तराखंड व दूसरे हिमालय क्षेत्रों की नदियों में बाढ़ आई इसमें वर्षा जल के runoff में यहां जल 20 से 30 प्रतिशत ही था बाकी ड्रेनेज सिस्टम में डाली गई मिट्टी की मात्रा 70 से 80 प्रतिशत अनुमानित होगी! इतना बड़ा सिल्ट लोड ही इतनी बड़ी त्रासदी के लिए जिम्मेदार है! अब विकास सस्टेनेबल यानी पर्यावरण सरंक्षण करते हुए ही किया जाना है! इसी प्रकार जल का सरंक्षण जरूरी है वर्षा जल को ड्रेनेज सिस्टम में रोका जाना यानी इसके बेग को कम कर भू जल में इजाफा किया जाना है और मिट्टी की वाटर सोखने की क्षमता को भी बढ़ाया जाना है जो वेजिटेशन से ही संभव है कुछ इंजीनियरिंग सपोर्ट की भी आवश्यकता होती है! धरती के बढ़ते तापमान को नियंत्रण करने के लिए सभी अपने अपने स्तर पर कार्बन डाइऑक्साइड जो कि बढ़ते तापमान के लिए मुख्य कारक है को न्यूट्रलाइज करने में योगदान देना है यह तभी संभव है जब प्रधानमंत्री से लेकर आम आदमी में जागरूकता होगी और संजीदगी से इसपर अमल होगा!

आने वाले समय में हम कांगड़ा जिला के साथ हिमाचल प्रदेश में पर्यावरण जागरूकता अभियान चला रहे हैं और जिला कांगड़ा आपदा प्रबंध का हिस्सा बन कर इस मुहिम को आगे बढ़ाएंगे! आओ मिलकर सभी पर्यावरण सरंक्षण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दें!

Dr

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