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ऊना के धौमेश्वर शिवलिंग (ध्यूंसर महादेव)मंदिर में हर वर्ष सुनहरी रंग के नाग-नागिन का जोड़ा मंदिर परिसर में प्रकट होता है और मंदिर में शिवलिंग के दर्शन करने के पश्चात लुप्त हो जाता है।

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ऊना के धौमेश्वर शिवलिंग (ध्यूंसर महादेव)मंदिर में हर वर्ष सुनहरी रंग के नाग-नागिन का जोड़ा मंदिर परिसर में प्रकट होता है और मंदिर में शिवलिंग के दर्शन करने के पश्चात लुप्त हो जाता है।
निर्भीक स्वतन्त्र लेखिक/ पत्रकार राम प्रकाश वत्स
हिमाचल प्रदेश के शिव मंदिरों की श्रृंखला में आपका परिचय कई ऐसे शिव मंदिरों से करा रहा हूं जो दिव्य शक्तियों से ओतप्रोत हैं, चमत्कारिक अद्भुत है लेकिन अनसुने हैं या फिर कम लोग जानते हैं इन मन्दिरों का इतिहास । इनका इतिहास भारत के पुरातन काल का बोध करवाता है । यह मन्दिर सृष्टि की रचना के इतिहास के गवाह है । असंख्य बरसों से भारत के धार्मिक एकता को संजोए हुए है।हिमाचल प्रदेश में कई पुरातन, ऐतिहासिक और चमत्कारिक धार्मिक मन्दिर स्थापितहैं। जिनका इतिहास असंख्य बर्ष पुरातन है । इसी कड़ी में हिमाचल प्रदेश के जिला ऊना में शिवालिक पहाड़ियों के आंचल में स्थित शिव मंदिरों का इतिहास का संबंध पुरातन काल से रहा है ।यह शिवलिंग अनुपम और चमत्कारी एवं असीम शाक्तियों के दिव्यता से ओतप्रोत है
हिमाचल प्रदेश की शिवालिक की पहाडि़यों के आंचल में स्थित जिला ऊना के तलमेहड़ा स्थान पर ध्यूंसर महादेव मंदिर की विशेष धार्मिक मान्यता है। ध्यूंसर महादेव की महिमा अपरंपार है। भोले के दरबार में जो भी भक्त सच्चे मन से अपनी मुराद मांगता है, भोलेनाथ उसे निश्चित ही पूरी करते हैं। वहीं इस मंदिर के बारे में यह भी मान्यता है कि हर वर्ष सुनहरी रंग के नाग-नागिन का जोड़ा मंदिर परिसर में प्रकट होता है और मंदिर में शिवलिंग के दर्शन करने के पश्चात लुप्त हो जाता है।
शिवलिंग को ध्यूंसर महादेव, सदाशिव के नाम से भी जाना जाता है– प्राचीन कथाओं के अनुसार लगभग 5600 वर्ष पूर्व महाभारत काल में पांडवों के पुरोहित श्री धौम्य ऋषि ने तीर्थ यात्रा करते हुए इसी ध्यूंसर नामक पर्वत पर शिव जी की तपस्या की थी। शिव जी ने प्रसन्न होकर दर्शन देते हुए वर मांगने को कहा, इस पर ऋषि ने वर मांगा कि जो कोई भी इस पुण्य क्षेत्र में आकर मेरे द्वारा स्थापित इस धौमेश्वर शिवलिंग की पूजा करेगा, उसकी मनोकामना पूर्ण हो जाए। शिव जी तथास्तु कह कर अंतर्ध्यान हो गए। ।(आज से ५००० वर्ष पूर्व द्वापरयुग में हुए ऋषि धौम्य पांडवो के पुरोहित, कृष्ण प्रेमी और महान शिवभक्त थे। उन्होंने उत्कोचक तीर्थ में निवास करके सालों तक तपश्वर्या की थी। वे प्रजापति कुशाश्व और धिषणा के पुत्र थे और इस सम्बन्ध से प्रसिद्ध ऋषि देवल, वेदशिरा आदि के भाई थे। उनको देवगुरु बृहस्पति के समतूल्य सम्मान दिया जाता हैं।)
इसीलिए प्राचीन काल से अब तक इस मंदिर में धौमेश्वर नामक शिवलिंग ध्यूंसर सदाशिव नाम से प्रसिद्ध है और जिसे शिवां नाम से भी जाना जाता है। सचमुच यहां का आलौकिक दृश्य और शांत वातावरण हर किसी को यहां आने के लिए विवश कर देता है।
कैसे पहुंचे मंदिर में :
सदाशिव मंदिर ध्यूंसर महादेव की दूरी सड़क मार्ग द्वारा बंगाणा-ऊना रोड़ पर नलवाड़ी चौक से वाया तलमेहड़ा लगभग 18 किलोमीटर है, वहीं धर्मशाला-ऊना रोड़ पर गांव बडूही से बंगाणा रोड़ पर लगभग 15 किलोमीटर है।

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